उरई जालौन न्यूज:- जब पत्रकार ना दे सहयोग तो क्या प्रशासन थाली तसला बजाकर करेगा लोगों को जागरूक
० अधिकारियों को फोटो चाहिए मेन फ्रंट पर पत्रकारों का सम्मान रखते बैक फ्रंट पर
० वैश्विक महामारी में पत्रकारों की भूमिका अहम, लेकिन पत्रकारों के प्रति प्रशासन के अधिकारियों का रवैया ठीक नहीं।
नसीम सिद्दीकी (संवाददाता)
उरई जालौन। देश का निरपेक्ष और लोगों की उम्मीद का किरण माने जाने वाला स्तंभ पत्रकारिता अब कुछ चापलूसों और शासन प्रशासन की अनदेखी से लड़खड़ाने लगा है। लोकतंत्र के चार स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता हैं. स्वाभाविक-सी बात है कि जिस सिंहासन के चार पायों में से एक भी पाया ख़राब हो जाये, तो वह अपनी आन-बान-शान गंवा देता है। जैसा की आप सभी को मालूमात है, कि देश विदेश के साथ हिंदुस्तान में भी एक ना दिखने वाले वायरस ने तबाही मचा रखी है। इस वायरस ने अभी तक हिंदुस्तान में लाखों लोगों को संक्रमित कर हजारों लोगों की जान ले ली वहीं अगर पूरे विश्व की बात करें तो लाखों लोगों की जान गई, और करोड़ों लोग इस वायरस से संक्रमित हैं। इस वायरस से लड़ने के लिए देश के प्रधानमंत्री द्वारा इसे महामारी घोषित करके स्वास्थ्य कर्मी, सफाई कर्मी, पुलिसकर्मी को कोरोना योद्धा घोषित कर दिया। वहीं देखा जाए तो शुरुआत जब इस वायरस की हुई, तो मीडिया कर्मी भी अपने आप को कोरोना योद्धा मानते थे।लेकिन सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट कर दिया कि मीडिया कर्मी का युद्ध में सम्मिलित नहीं है।जब से लॉक डाउन लगा और वैश्विक महामारी फैली है। कोरोना योद्धाओं से बढ़कर मीडिया कर्मियों का योगदान रहा है, हर पल की जानकारी के साथ लोगों को जागरूक करने में अहम भूमिका निभाने वाला चौथा स्तंभ अगर देखा जाए तो कोरोना योद्धाओं से भी बढ़कर है। हर पल उच्च अधिकारियों के साथ सड़क पर खड़े पुलिसवालों और अस्पतालों में संक्रमित मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों के पास उनका हाल देश के सामने रखने में मीडिया कर्मियों को महत्वपूर्ण योगदान रहा। जब किसी संक्रमित मरीजों को कोई परेशानी होती तो मीडिया के माध्यम से उसको दूर करा जाता और वही किस तरह यह योद्धा इस महामारी को हराने में लगे हुए हैं। यह देश के सामने स्पष्ट रूप से रखना पत्रकारों की अहम जिम्मेदारी बन गई थी। इसको देखते हुए सभी पत्रकारों ने निष्पक्ष और ईमानदारी के साथ और कवरेज को जनता तक पहुंचाया। देश भर में जहां कोई संक्रमित मरीज निकलता तो उसके आसपास क्षेत्र के साथ लोगों को जागरूक और साथ में जो उसके संपर्क में लोग आए उनका नाम शासन तक पहुंचाने का काम मीडिया कुछ मिनटों में पूरा कर रही थी। प्रशासन द्वारा सिर्फ यह जानकारी दी जाती कि इस क्षेत्र में यह मरीज संक्रमित निकला ना तो स्वास्थ विभाग की गाड़ी और ना तो प्रशासन के अधिकारी उस जगह पर पहुंच पाते उससे पहले मीडिया द्वारा वहां के लोगों को जागरूक कर सतर्क कर दिया जाता है। इसके बाद भी अगर देखा जाए तो प्रशासन के अधिकारियों का मीडिया के प्रति जो व्यवहार है। वह कुशल पूर्ण नहीं देखा गया यह बात हम अपने जनपद कि नहीं कर रहे देखा जाए तो आसपास के जनपदों में ऐसे कई मामले आए छोटी-छोटी बातों पर पत्रकारों में मुकदमे लिखवा दिए गए। प्रशासन ने यह भी नहीं सोचा कि जिन पत्रकारों ने आपको जनता के साथ, प्रशासन के अधिकारियों के सामने एक योद्धा के रूप में प्रदर्शित किया और आपने उसी के साथ अन्याय पूर्ण व्यवहार किया। अगर पत्रकार प्रशासन का सहयोग नहीं करते कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चलते तो क्या प्रशासन के अधिकारी और कर्मचारी थाली तसला बजा कर लोगों को जागरूक करते। वहीं अगर देखा जाए पत्रकारों को कोरोना योद्धाओं का सम्मान ना मिलने के बाद भी छोटे से लेकर बड़े अधिकारी के कंधे से कंधा मिलाकर इस महामारी में पहुंचा सहयोग दिया अगर उसके बाद भी अधिकारी उन पत्रकारों सम्मान नहीं करते। तो इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण उन अधिकारियों के लिए और कुछ नहीं होगा। वहीं देखा जाए तो कुछ प्रशासन के अधिकारी फोटो पेपर के फ्रंट पेज पर मांगते और पत्रकारों को सम्मान है, बैक फ्रेंड पर रखते।ऐसा कई बार जनपद में इस लॉक डाउन में देखने को मिला कई पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई और बदसलूकी करने वाले कोई उच्चाधिकारी नहीं नई भर्ती होकर आए सिपाहियों ने कर दी उन सिपाहियों को यह तक ज्ञान नहीं वह एक सरकारी विभाग के कर्मचारी हैं। देश की सेवा में लगे निस्वार्थ निशुल्क सेवा भाव वाले पत्रकारों से बदसलूकी करके किसका अहित करेंगे। वही पत्रकारों को सम्मान और आधार करने के लिए शासन को भी सोचना चाहिए वहीं पर शासन को पत्रकारों को उनका सहयोग देना चाहिए तभी जाकर अपनी वाहवाही करा पाएंगे नहीं तो सच लिखना पत्रकारों को बखूबी आता है।
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